प्रेम की पिपासा बढ़ी देख निज प्रेमियों की -  श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (18)

प्रेम की पिपासा बढ़ी देख निज प्रेमियों की - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (18)

प्रेम की पिपासा बढ़ी देख निज प्रेमियों की,
प्रेम का समुद्र सीमा तोड़ के बहाया है। [1]
भावुक रसीले जन निराश न होंगे अब,
कामना - पूर्तिकर कल्पतरु लगाया है॥ [2]
चिन्तांमणि जटित चारुचादर बिछाई ये,
कुंज प्रति कुंज भाँति भाँति से सजाया है। [3]
भारत का भूषण औ तिलक तीन लोकों का,
भक्तों के वास हेतु वृन्दावन बनाया है॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (18)

श्री राधा कृष्ण ने जब देखा कि उनके निज प्रेमियों की पिपासा बढ़ गई है तो उन्होंने अगाध प्रेम का समुद्र सीमा तोड़ कर बहा दिया। [1]

अब भावुक रसिक भक्त निराश नहीं होंगे क्योंकि समस्त कामना को पूर्ण करने के लिए कल्पतरु लगाये गये हैं। [2]

जहां की रज एक चिंतामणि चादर के समान बिछाई गई है और जहां के कुंजों को भाँति भाँति सुंदरता से सजाया गया है। [3]

इस दिव्य धाम का नाम वृंदावन है और जो भारत का ही नहीं अपितु तीन लोकों का भी भूषण है जिसे भक्तों के वास के हेतु ही राधा कृष्ण ने बनाया है। [4]