रसनिधि मन मधुकर रमहिं, जो चरनांबुज माहिं - श्री रस निधि जी

रसनिधि मन मधुकर रमहिं, जो चरनांबुज माहिं - श्री रस निधि जी

रसनिधि मन मधुकर रमहिं, जो चरनांबुज माहिं।
सरस अनखुलौ खुलत है, खुलौ खुलौई नाहिं ॥

- श्री रस निधि जी

रसनिधि कहते हैं कि जिनका मन रूपी भौंरा श्री राधा-कृष्ण के चरण-कमलों में रम जाता है, उनके लिए संसारी लोगों के लिए सदा बंद रहने वाला प्रभु का स्वरूप सहज ही खुल जाता है और दृश्यमान संसार बंद हो जाता है।