(कवित्त)
बलि बलि श्रीराधा नाम प्रेम रस रंग भर्यो।
रसिक अनन्यनि जानि सुसर्वस उर धर्यो॥ [1]
रटत रहैं दिन रैन मगन मन सर्वदा।
परम धरम धन धाम नहिं बिसरै कदा॥ [2]
कदा विसरत नहि नेही लाल उरमाला रची।
रही जगमगि नवल हिय में मनौ मनि गनि सौं खची॥ [3]
चतुर वेद कौ सार संचित प्रेम विवरन निज रह्यो।
बलि बलि श्रीराधा नाम प्रेम रस रंग भरयो॥ [4]
- श्री अलबेली अलि
श्री राधा नाम पर मैं बलिहारी जाता हूँ जो प्रेम रस के रंग से भरा हुआ है जिसे अनन्य रसिक श्री श्यामसुन्दर (एवं रसिक जन) अपना सर्वस्व मान कर अपने ह्रदय में सदा धारण करते हैं। [1]
उनका मन सदा राधा नाम में मगन रहता है जिसे वे अपना परम धन धाम मान कर कभी भी (एक क्षण को भी) बिसारते नहीं हैं। [2]
प्रेमी श्री लाल जी [कृष्ण] ने अपने ह्रदय में श्री राधा नाम की मानो एक ऐसी माला रची है जो उनके ह्रदय में सदा एक नित्य नवीन मणि के समान जगमगाती रहती है। [3]
श्री अलबेली अलि जी कहते हैं कि जो चारों वेदों का सार है, एवं जो हर क्षण परम प्रेम का संचार करने वाला है, ऐसे श्री राधा नाम पर सर्वस्व न्यौछवार है जो सदा प्रेम रस के रंग से भरा रहता है। [4]
बलि बलि श्रीराधा नाम प्रेम रस रंग भर्यो।
रसिक अनन्यनि जानि सुसर्वस उर धर्यो॥ [1]
रटत रहैं दिन रैन मगन मन सर्वदा।
परम धरम धन धाम नहिं बिसरै कदा॥ [2]
कदा विसरत नहि नेही लाल उरमाला रची।
रही जगमगि नवल हिय में मनौ मनि गनि सौं खची॥ [3]
चतुर वेद कौ सार संचित प्रेम विवरन निज रह्यो।
बलि बलि श्रीराधा नाम प्रेम रस रंग भरयो॥ [4]
- श्री अलबेली अलि
श्री राधा नाम पर मैं बलिहारी जाता हूँ जो प्रेम रस के रंग से भरा हुआ है जिसे अनन्य रसिक श्री श्यामसुन्दर (एवं रसिक जन) अपना सर्वस्व मान कर अपने ह्रदय में सदा धारण करते हैं। [1]
उनका मन सदा राधा नाम में मगन रहता है जिसे वे अपना परम धन धाम मान कर कभी भी (एक क्षण को भी) बिसारते नहीं हैं। [2]
प्रेमी श्री लाल जी [कृष्ण] ने अपने ह्रदय में श्री राधा नाम की मानो एक ऐसी माला रची है जो उनके ह्रदय में सदा एक नित्य नवीन मणि के समान जगमगाती रहती है। [3]
श्री अलबेली अलि जी कहते हैं कि जो चारों वेदों का सार है, एवं जो हर क्षण परम प्रेम का संचार करने वाला है, ऐसे श्री राधा नाम पर सर्वस्व न्यौछवार है जो सदा प्रेम रस के रंग से भरा रहता है। [4]

