मैं बोले मारी गई, देखौ अजया आँत -  श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (22)

मैं बोले मारी गई, देखौ अजया आँत - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (22)

मैं बोले मारी गई, देखौ अजया आँत ।
पीजन लगि लागी कुटन, तब तै बोलै ताँत ॥

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (22)

भगवत रसिक जी कहते हैं कि बकरी के “मैं-मैं” करने का परिणाम तो देखिए, वह “मैं-मैं” बोलने के कारण मारी गई। फिर उसी बकरी की अँतड़ी जब ताँत के रूप में धुनकी में लगकर कुटने लगी, तब वही “तें-तें” (तुहि तुहि) बोलने लगी।