कौन चूक चित धरी स्वामिनी जो मम सुरति विसारी -  ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (25)

कौन चूक चित धरी स्वामिनी जो मम सुरति विसारी - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (25)

(राग देस उतरी)
कौन चूक चित धरी स्वामिनी जो मम सुरति विसारी । [1]
निज सेवा तें छेंकि दई हा श्रीवनतें करी न्यारी ॥ [2]
जद्यपि नहिं उचित कछु कहिवो दुख नहिं जात सहारी । [3]
ललितकिशोरी वेगी वुलावहु, करौ टहल अधिकारी ॥ [4]

- ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (25)

हे स्वामिनी (राधारानी) ऐसा मुझसे कौन सा अपराध बन गया कि आपने मुझे भुला ही दिया । [1]

ऐसा क्या हुआ कि आपने मुझे अपनी निज सेवा से हटा दिया और वृंदावन से भी दूर कर दिया । [2]

यद्यपि मुझे कुछ कहना तो नहीं चाहिए परंतु मैं भी क्या करूँ, मुझसे यह  दुख सँभाले नहीं संभल रहा । [3]

श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि हे राधे रानी, कृपा कर मुझे जल्द ही वृंदावन बुला लो और अपनी महल टहल (सेवा) का अधिकार दे दो ।  [4]