वृन्दावन की गैल में मुक्ति पड़ी विलखाय - ब्रज के सवैया

वृन्दावन की गैल में मुक्ति पड़ी विलखाय - ब्रज के सवैया

वृन्दावन की गैल में, मुक्ति पड़ी विलखाय।
मुक्ति कहै गोपाल सों, मेरी मुक्ति बताय॥ [1]
पड़ी रहो या गैल में, साधु संत चलि जाँय।
उड़-उड़ रज मस्तक लगै, मुक्ति मुक्त ह्वै जाय॥ [2]

- ब्रज के सवैया

श्री वृंदावन धाम की गलियों में मुक्ति व्याकुल होकर एक कोने में पड़ी गोपाल से पूछती है—“हे प्रभु! मेरी मुक्ति कैसे होगी?” [1]

तब श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं—“श्री वृंदावन धाम की गलियों में ही पड़ी रहो, जहाँ साधु-संत विचरण करते हैं। जब रसिक संत चलेंगे और उनके चरणों की रज उड़कर तुम्हारे मस्तक पर पड़ेगी, तब तुम वास्तव में मुक्त हो पाओगी।” [2]