प्रेम्णः सन्मधुरोज्ज्वलस्य हृदयं श्रृंगारलीलाकला वैचित्री परमावधिर्भगवतः पूज्यैव कापीशता ।
ईशानी च शची महासुख तनुः शक्तिः स्वतन्त्रा परा श्रीवृन्दावन नाथ पट्टमहिषी राधैव सेव्या मम ॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (78)
जो मधुर और उज्ज्वल प्रेम की प्राण-स्वरूपा, श्रृंगार रस की लीला कलाओं की विचित्रता की सर्वोच्च अवधि, भगवान् श्रीकृष्ण की आराधनीया कोई अनिर्वचनीया शासन-कर्ती हैं। जो ईश्वर-रूप श्रीकृष्ण की शची हैं तथा समस्त ऐश्वर्य शक्तियाँ पार्वती, इन्द्राणी और महासुख स्वरूपा की स्वतन्त्र सुखमय वपुधारिणी शक्ति हैं; वे श्रीवृन्दावन के नाथ की पटरानी 'श्रीराधा' ही केवल मेरी सेव्या एवं आराध्या हैं ।
ईशानी च शची महासुख तनुः शक्तिः स्वतन्त्रा परा श्रीवृन्दावन नाथ पट्टमहिषी राधैव सेव्या मम ॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (78)
जो मधुर और उज्ज्वल प्रेम की प्राण-स्वरूपा, श्रृंगार रस की लीला कलाओं की विचित्रता की सर्वोच्च अवधि, भगवान् श्रीकृष्ण की आराधनीया कोई अनिर्वचनीया शासन-कर्ती हैं। जो ईश्वर-रूप श्रीकृष्ण की शची हैं तथा समस्त ऐश्वर्य शक्तियाँ पार्वती, इन्द्राणी और महासुख स्वरूपा की स्वतन्त्र सुखमय वपुधारिणी शक्ति हैं; वे श्रीवृन्दावन के नाथ की पटरानी 'श्रीराधा' ही केवल मेरी सेव्या एवं आराध्या हैं ।

