प्‍यारे वृन्‍दावन के रूख -  श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (10)

प्‍यारे वृन्‍दावन के रूख - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (10)

(राग सारंग)
प्‍यारे वृन्‍दावन के रूख ।
जिनितर राधा-मोहन विहरत देखत भाजत भूख ॥ [1]
माया काल न व्‍यापै जिनितर सींचे प्रेम-पियूख ।
कोटि गाय बाँझन हत शाखा तोरत हरिहिं विदूख ॥ [2]
रसिकनि पारिजात सूझत हैं विमुखनि ढ़ाक पिलूख ।
जो भजिये तौ तजिये पान मिठाई मेवा ऊख ॥ [3]
जिनि के रस-बस गोपिनु छाँड़े सुख-संपति गृह तूख ।
मणि कंचन मय कुंज विराजत रंध्रनि चन्‍द्र मयूख ॥ [4]
जिहिं रस भोजन तज्‍यौ परीक्षित उपज्‍यौ शुकहिं अतूख।
व्‍यास पपीहा बन-घन सेयौ दुख-सलिता-सर सूख ॥ [5]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (10)

वृंदावन के वृक्ष अत्यंत प्यारे हैं जिनको देखकर समस्त कामनाएँ विलीन हो जाती हैं क्योंकि इनके नीचे सदा श्री राधा मोहन विहार करते हैं । [1]

यह सदा प्रेम से सिंचें हुए हैं अत: यहाँ माया काल प्रवेश नहीं कर पाते । इन वृक्षों की शाखा तोड़ने से श्री हरि को कोटि गौ हत्या से भी अधिक कष्ट होता है । [2]

रसिकों को यह सब कल्‍पवृक्ष दिखते हैं और विमुखों को पलाश-पिलूख दिखलाई देते हैं। इन वृक्षों का भजन संपूर्ण मिथ्या भोग (सम्‍पूर्ण स्‍वादों) को त्याग कर किया जाता है । [3] 

गोपियों ने गृहादिक की सुख-संपत्ति को छोड़ कर इनका भजन किया था। यहाँ की कुंजें मणि कंचनवत् जटित हैं (इसका एक अर्थ इन्द्रनीलमणि श्याम एवं कंचन तनी श्यामा भी है) जो चंद्र की किरणें से शोभायमान हैं । [4]

यही रस पान करके परीक्षित ने भोजन छोड़ दिया था और शुक-मुनि को अपने ब्रह्मज्ञान से अतृप्ति हो गई थी । श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि मैंने पपीहा बन कर वृन्‍दावन-घन का सेवन किया जिससे मेरे समस्त दुख के सर-सरिता सूख गये हैं। [5]