तन सौं तन मन सौं जु मन, मिले प्राण अरु नैन।
तीव्र प्रेम को रूप यह, तऊ हिेये नहि चैन॥
- श्री भजनदास
प्रिया-प्रियतम के तन से तन, मन से मन, प्राण से प्राण और नेत्रों से नेत्र पूर्णतः मिल चुके हैं। यह तीव्र और प्रगाढ़ प्रेम का वह स्वरूप है जहाँ द्वैत का लेश भी नहीं है, फिर भी उनके हृदय को तृप्ति नहीं होती और मिलन की प्यास सदैव बनी रहती है।
तीव्र प्रेम को रूप यह, तऊ हिेये नहि चैन॥
- श्री भजनदास
प्रिया-प्रियतम के तन से तन, मन से मन, प्राण से प्राण और नेत्रों से नेत्र पूर्णतः मिल चुके हैं। यह तीव्र और प्रगाढ़ प्रेम का वह स्वरूप है जहाँ द्वैत का लेश भी नहीं है, फिर भी उनके हृदय को तृप्ति नहीं होती और मिलन की प्यास सदैव बनी रहती है।

