तो सम को प्यारो नहि प्यारी -  श्री केवल राम जी, रास मान के पद (5)

तो सम को प्यारो नहि प्यारी - श्री केवल राम जी, रास मान के पद (5)

तो सम को प्यारो नहि प्यारी ।
तन मन धन तुम प्रान लाल के ससि जिउ सुधा किरणि उजिआरी ॥ [1]
जिउ दामुनि बिनु घन की सोभा तैसे तुम बिनु कुंजबिहारी ।
बेगि मानु तजि मिलहु लाल सों जिय की जीवनि सोभा न्यारी ॥ [2]
तुम हो चतुर प्रवीनि लाडली रूप सिंधु सीवाँ न तिहारी ।
केवल रसि मिलु रसु उपजावो उह नटु तूँ वृषभान दुलारी ॥ [3]

- श्री केवल राम जी, रास मान के पद (5)

एक सखी, माननी श्री राधिका से कहती हैं, हे प्यारी, तुम्हारे जैसा प्रियतम किसी का नहीं है। तुम ही तो लालजी (श्रीकृष्ण) का तन, मन, धन और प्राण हो, जैसे चंद्रमा की उजियारी किरणें होती हैं । [1]

जिस प्रकार बिजली के बिना काले बादल की सुंदरता नहीं है उसी प्रकार तुम्हारे बिना कुंज बिहारी की शोभा नहीं । कृपया जल्दी से अपना मान त्याग दें और लाल जी से मिलें जो आपके ह्रदय का जीवन है और जिसकी शोभा सबसे न्यारी है । [2]

हे लाड़िली, तुम परम प्रवीण हो और तुम्हारे रूप सुधा की कोई सीमा नहीं है । श्री केवलराम कहते हैं, कृपया श्री कृष्ण से रस पूर्वक मिलें, रस बरसाएं क्योंकि वे नटवर हैं और तुम श्री वृषभानु जी की दुलारी बेटी हो। [3]