ऐसौ वृंदाविपिन है, सर्वस रस को सार - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (15)

ऐसौ वृंदाविपिन है, सर्वस रस को सार - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (15)

ऐसौ वृंदाविपिन है, सर्वस रस को सार।
श्री राधावर लाल को, निति नव नित्य विहार॥

- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (15)

यह श्री वृन्दावन ऐसा दिव्य और अनूठा धाम है, जहाँ समस्त रसों का सार—प्रिया-प्रियतम का नित्य विहार रस—हर क्षण बरसता रहता है।