ताके वल गर्वभरे रसिकव्यास से न डरे - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (72)

ताके वल गर्वभरे रसिकव्यास से न डरे - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (72)

ताके वल गर्वभरे रसिकव्यास से न डरे,
लोक वेद कर्म धर्म छाँड़ि मुकुति चारि ॥

- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (72)

श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि उन्हीं श्री राधा के बल के गर्व में मैंने लोक, वेद, कर्म, धर्म एवं चारों प्रकार की मुक्ति का निर्भयता पूर्वक त्याग कर दिया है । [4]