नेह निगौड़े को पैडौ ही न्यारौ - श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा (4.70)

नेह निगौड़े को पैडौ ही न्यारौ - श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा (4.70)

(राग पूर्वी)
नेह निगौड़े को पैडौ ही न्यारौ ।
जो कोई होय कैं आंधौ चलै,
सुलहै प्रिय वस्तु चहूँघा उजारौ ॥ [1]
सो तो इतै उत भूल्यौ फिरै न,
लहै कछु जो कोउ होइ अंख्यारौ ।
'वृन्दावन' सोई याको पथिक है,
जापै कृपा करै कान्हर कारौ ॥ [2]

- श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा (4.70)

प्रेम के मार्ग की गति ही न्यारी है । जो भी इस मार्ग का पथिक है उसे अंधा होकर ही चलना होता है (अर्थात् यहाँ आत्मसमर्पण कर चला जाता है और प्रेमास्पद के बाह्य गुण एवं दोष को नहीं देखा जाता) तभी उसे वस्तु की प्राप्ति हो सकती है । [1]

जिसकी आँखें होती हैं वो तो इस मार्ग में कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता; उसेतो भूल कर भी इस प्रेम मार्ग में नहीं आना चाहिए । श्री वृंदावन देवाचार्य जी कहते हैं कि यह मार्ग बड़ा कठिन है, इस पर यदि कोई कदाचित् साहस करके चल भी पड़े तो भी उसको तब तक सफलता नहीं मिलेगी जब तक काले कन्हैया की कृपा न हो चुकी हो । [2]