अनहोनी नहिं होइ कछु - श्री भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (18)

अनहोनी नहिं होइ कछु - श्री भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (18)

अनहोनी नहिं होइ कछु, होनी मिटै न कोय ।
देखौ सीता दसरथै, अति समर्थ तहँ दोय ॥ [1]
अति समर्थ तहँ दोय, राम भर्ता, वसिष्ठ गुरु ।
यदुवंसिन को नास भयौ देखत परमेसुरु ॥ [2]
पारीछत उर ब्याल मृतक पहिरायौ मौनी ।
भगवत इच्छा जानि, नहीं यामैं अनहोनी ॥ [3]

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (18)

यदि  कुछ नहीं होना होता तो वह नहीं होता, और यदि कुछ होना होता है तो उसे कोई रोक नहीं सकता । उदाहरण के लिए सीता जी और दशरथ जी को ही देख लो, दोनों परम समर्थवान थे । [1]

सीता जी के पति साक्षात भगवान राम थे, और दूसरी ओर दशरथ जी के गुरु महर्षि वशिष्ठ थे, फिर भी जो जिसको भोगना है वो उसे भोगना ही पड़ेगा (चाहे वो कोई भी हो) । भगवान श्री कृष्ण साक्षात परमेश्वर थे, परंतु उनके देखते देखते ही यदुवंशियों का नाश हो गया । [2]

परीक्षित ने ध्यान करते हुए शमीक ऋषि के कंठ में मरा हुआ सर्प डाला  (जिसके कारणवश ही शमीक ऋषि के पुत्र ने उन्हें श्राप दिया और साँप के काटने से ही परीक्षित की 7 दिन के बाद मृत्यु हो गई )। श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि इन प्रसंगों से यह जान लेना चाहिए कि जो कुछ भी होता है वो श्री हरि की इच्छा से ही होता है, इसमें कहीं कुछ भी अनहोनी नहीं होती । [3]