राधा पग मंजीर-धुनि परै कहूँ जो कान -  श्री ब्रजजीवन जी

राधा पग मंजीर-धुनि परै कहूँ जो कान - श्री ब्रजजीवन जी

राधा पग मंजीर-धुनि, परै कहूँ जो कान ।
कृत्य-कृत्य ह्वै जात पिय, जीवन रसिक सुजान ॥

- श्री ब्रजजीवन जी

ज्यों ही श्री राधा के चरणों के नूपुर की मधुर ध्वनि रसिक शिरोमणि श्री कृष्ण चंद्र के कानों में पड़ती है, वे पूर्ण कृतार्थ हो उठते हैं; क्योंकि रसिकों का जीवन ही श्री प्यारी जू के चरणारविंद हैं।