(राग बिलावल)
तू रति रंगभरी देखियत है श्री राधे,
रहसि रमी मोहन सों व रैन। [1]
गति अति सिथिल, प्रगट पलटे पट,
गौर अंग पर राजत अैन॥ [2]
जलज कपोल ललित लटकति लट,
भृकुटि कुटिल ज्यौं धनुष धृत मैन। [3]
सुंदरी रहिव कहिव कंचुकी कत,
कनक-कलश कुच बिच नख दैन। [4]
अधर-बिंब दल मलित आलस जुत,
अरु आनंद सूचत सखि नैन। [5]
(जैश्री) हित हरिवंश दुरत नहिं नागरी,
नागर मधुप मथत सुख-सैन॥ [6]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (10)
हे श्रीराधे, आज तुम प्रेम-रंग भरी दिखलाई दे रही हो, मालूम होता है कि तुमने अपने मोहन प्रियतम के साथ रात्रि में एकान्त रमण किया है। [1]
तुम्हारी गति अत्यन्त शिथिल हो रही है। तुमने अपने वस्त्र (नीलाम्बर) के बदले में प्रियतम का वस्त्र (पीताम्बर) प्रकट से ओढ़ रखा है जो तुम्हारे गौर अंग पर अत्यन्त शोभायमान हो रहा है। [2]
तुम्हारे कमल के समान गुलाबी कपोलों पर सुन्दर लटें लटक रही हैं और तुम्हारी बंक भृकुटि कामदेव के धनुष के समान जान पड़ती हैं। [3]
हे सुन्दरि, तनिक ठहरो और यह बताओ कि तुम्हारी कंचुकी कहाँ है और तुम्हारे सुवर्ण-कलश के समान कुचों पर नख-चिन्ह क्यों लग रहे हैं? [4]
तुम्हारे बिंब के समान लाल अधर दलमलित हो रहे हैं और हे सखी, तुम्हारे नेत्र आलस्य पूर्ण होते हुये भी आनन्द का सूचन कर रहे हैं। [5]
सखी भावापन्न श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि हे नागरि, चतुर मधुप तुम्हारे प्रियतम ने सुख शैया पर बल पूर्वक तुम्हारा रस ग्रहण किया है, यह बात छिपाने से भी नहीं छिप रही है। [6]
तू रति रंगभरी देखियत है श्री राधे,
रहसि रमी मोहन सों व रैन। [1]
गति अति सिथिल, प्रगट पलटे पट,
गौर अंग पर राजत अैन॥ [2]
जलज कपोल ललित लटकति लट,
भृकुटि कुटिल ज्यौं धनुष धृत मैन। [3]
सुंदरी रहिव कहिव कंचुकी कत,
कनक-कलश कुच बिच नख दैन। [4]
अधर-बिंब दल मलित आलस जुत,
अरु आनंद सूचत सखि नैन। [5]
(जैश्री) हित हरिवंश दुरत नहिं नागरी,
नागर मधुप मथत सुख-सैन॥ [6]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (10)
हे श्रीराधे, आज तुम प्रेम-रंग भरी दिखलाई दे रही हो, मालूम होता है कि तुमने अपने मोहन प्रियतम के साथ रात्रि में एकान्त रमण किया है। [1]
तुम्हारी गति अत्यन्त शिथिल हो रही है। तुमने अपने वस्त्र (नीलाम्बर) के बदले में प्रियतम का वस्त्र (पीताम्बर) प्रकट से ओढ़ रखा है जो तुम्हारे गौर अंग पर अत्यन्त शोभायमान हो रहा है। [2]
तुम्हारे कमल के समान गुलाबी कपोलों पर सुन्दर लटें लटक रही हैं और तुम्हारी बंक भृकुटि कामदेव के धनुष के समान जान पड़ती हैं। [3]
हे सुन्दरि, तनिक ठहरो और यह बताओ कि तुम्हारी कंचुकी कहाँ है और तुम्हारे सुवर्ण-कलश के समान कुचों पर नख-चिन्ह क्यों लग रहे हैं? [4]
तुम्हारे बिंब के समान लाल अधर दलमलित हो रहे हैं और हे सखी, तुम्हारे नेत्र आलस्य पूर्ण होते हुये भी आनन्द का सूचन कर रहे हैं। [5]
सखी भावापन्न श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि हे नागरि, चतुर मधुप तुम्हारे प्रियतम ने सुख शैया पर बल पूर्वक तुम्हारा रस ग्रहण किया है, यह बात छिपाने से भी नहीं छिप रही है। [6]

