सुनो मन यह अनन्य की रीत -  श्री कृपालुजी, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (119)

सुनो मन यह अनन्य की रीत - श्री कृपालुजी, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (119)

सुनो मन! यह अनन्य की रीत ।
गौर श्याम-प्रिय परिजन तजि कहुँ, करत न सपनेहुँ प्रीत ॥ [1]
भुक्ति मुक्ति बैकुण्ठ आदि सों, रहत अतीत अजीत ।
रसिकनि तजि श्री महाविष्णु को, करत न भूलेहुँ मीत ॥ [2]
विधि निषेध अरु लोक वेद की, रहत न नेकहुँ भीत ।
रह प्रति रोम ‘कृपालु’ गौर-हरि, अरु हरिजन परतीत ॥ [3]

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (119)

हे मन! मैं तुमको अनन्य प्रेम का सिद्धांत समझाता हूँ, ध्यान देकर सुनो । श्यामा- श्याम का अनन्य प्रेमी केवल श्यामा-श्याम एवं उनके परिकर (सेवक) रसिक-जनों के सिवाय अन्यत्र कहीं भी, स्वप्न में भी, अपना सम्बन्ध नहीं जोड़ता । [1]

संसार के सुख, मोक्ष सुख एवं बैकुण्ठ आदि लोकों के सुखों से सर्वथा परे रहता है, अर्थात् बैकुण्ठ पर्यन्त के किसी भी सुख के चक्कर में नहीं पड़ता । इन सब सुखों को जीतकर वह अनन्य भाव ग्रहण करता है । राधा-कृष्ण के परिकर रसिक-जनों को छोड़कर बैकुंठ के स्वामी महाविष्णु को भूलकर भी मित्र नहीं बनाता । [2]

कर्तव्य, अकर्तव्य एवं लौकिक, वैदिक आज्ञाओं से भी अनन्य प्रेमी थोड़ा भी भयभीत नहीं होता। श्री कृपालु जी कहते हैं कि अनन्य प्रेमी के रोम-रोम में एकमात्र राधा-कृष्ण एवं राधा-कृष्ण प्रेमियों का पूर्ण विश्वास रहता है । [3]