आरति करत बिहार की, सब आरति बिसराई ।
आगि बारि आरति करैं, सेवत ख़सम खिजाइ ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (370)
अखंड नित्य-विहार के अनन्य उपासक के लिए बाह्य आरती गौण हो जाती हैं; उसका मन तो केवल प्रिया-प्रियतम के विहार के लिए ही निरंतर व्याकुल रहता है। इसी प्रेमभरी आर्तता को वे सच्ची “आरती” मानते हैं; और जो लोग केवल बाह्य रूप से बार-बार आरती करते हैं, उनको ऐसा समझना चाहिए जैसे कोई स्त्री अपने पति को खिजा-खिजा कर सेवा करती है।
आगि बारि आरति करैं, सेवत ख़सम खिजाइ ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (370)
अखंड नित्य-विहार के अनन्य उपासक के लिए बाह्य आरती गौण हो जाती हैं; उसका मन तो केवल प्रिया-प्रियतम के विहार के लिए ही निरंतर व्याकुल रहता है। इसी प्रेमभरी आर्तता को वे सच्ची “आरती” मानते हैं; और जो लोग केवल बाह्य रूप से बार-बार आरती करते हैं, उनको ऐसा समझना चाहिए जैसे कोई स्त्री अपने पति को खिजा-खिजा कर सेवा करती है।

