जय जय चतुरि चूड़ामनी -  श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (82)

जय जय चतुरि चूड़ामनी - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (82)

(दोहा)
चतुर-चारु-चूड़ामनी, स्वामिनि हियहरनी जु ।
जय जय सुख-संपति-सनी, बर चंपक-बरनी जु ॥


(पद) [राग केदारौ]
जय जय चतुरि चूड़ामनी ।
चारु चंचल-लोचनी  चितहरनि चन्द्राननी ॥ [1]
जयति  सुख-सौन्दर्य-संपति, सुद्ध चम्पक तनी ।
स्वामिनी  श्रीहरिप्रिया नित सहज रंगही सनी ॥ [2]

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (82)

(दोहा)
हे श्रेष्ठ चम्पक-पुष्प सरीखी कान्ति वाली स्वामिनी जी (श्री राधे), आपकी जय हो! आप सब चतुरों की शिरोमणि हो। लालजू तथा सबके मनों को हरन करने वाली हो। आप सब प्रकार की सुख-सम्पत्तियों से युक्त हो।

(पद)
सब चतुरों की चुड़ामणि स्वरूपा आपको जय हो । हे चन्द्रा, आप अपने नेत्र कमलों की भ्रूभंगी से लाल के मन को चुराती रहती हो । हे शुद्ध चम्पक पुष्प सरीखी कान्ति वाली, आपने लाल को वश में कर रखा है । [1]

आप ही सब सुख, सौन्दर्य तथा सम्पति युक्ता हो । हे श्रीहरिप्रिया की स्वामिनी जी! आप ही लाल जी के अनुराग से सदा रंजित रहती हो । [2]