(राग परज, त्रिताल)
राधा-राधा जप तू मना रे।
नाम सुधा लीला दरसावे, राख भरोस प्रिया चरणा रे॥ [1]
रसिक रास-रस मिलि हैं तोहे, जो हो जा नाम शरणा रे।
हितगोपाल श्रीप्रिया शरण हो, वृन्दावन रस मन लगना रे॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (86)
हे मन, तू निरंतर ‘राधा राधा’ जप ले। जब तू हृदय से राधा सुधा रस पियेगा (यह मानकर कि राधा नाम में राधा रानी साक्षात बैठीं हैं) तो यही नाम तुझे लीला का दर्शन करवा देगा। तू श्री प्रियाजी (राधा रानी) के चरणों में विश्वास तो रख। [1]
तुझे रसिकों द्वारा ग्रहण किया हुआ दुर्लभ रास रस मिलेगा यदि तू इस “राधा" नाम की शरण में हो जाएगा। श्री हित गोपाल दास जी कहते हैं कि नाम की कृपा से वे तो अब श्री प्रिया जी के शरण में हैं और उनका मन अब वृंदावन रस में लग चुका है। [2]
राधा-राधा जप तू मना रे।
नाम सुधा लीला दरसावे, राख भरोस प्रिया चरणा रे॥ [1]
रसिक रास-रस मिलि हैं तोहे, जो हो जा नाम शरणा रे।
हितगोपाल श्रीप्रिया शरण हो, वृन्दावन रस मन लगना रे॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (86)
हे मन, तू निरंतर ‘राधा राधा’ जप ले। जब तू हृदय से राधा सुधा रस पियेगा (यह मानकर कि राधा नाम में राधा रानी साक्षात बैठीं हैं) तो यही नाम तुझे लीला का दर्शन करवा देगा। तू श्री प्रियाजी (राधा रानी) के चरणों में विश्वास तो रख। [1]
तुझे रसिकों द्वारा ग्रहण किया हुआ दुर्लभ रास रस मिलेगा यदि तू इस “राधा" नाम की शरण में हो जाएगा। श्री हित गोपाल दास जी कहते हैं कि नाम की कृपा से वे तो अब श्री प्रिया जी के शरण में हैं और उनका मन अब वृंदावन रस में लग चुका है। [2]

