सर्वज्ञोपि परेशोपि मुग्ध मुग्धोति नीचवत् ।
चाटूनि कुरुते यस्याः सैव मे जीवनेश्वरी ॥
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (8)
जो सर्वज्ञ और परेश (परम-प्रभु) होकर भी मुग्ध दशा में दीनवत् जिनकी चाटुकारी करते हैं, वही [कृष्ण-प्रिया श्रीराधिका] मेरी एक मात्र गति हैं।
चाटूनि कुरुते यस्याः सैव मे जीवनेश्वरी ॥
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (8)
जो सर्वज्ञ और परेश (परम-प्रभु) होकर भी मुग्ध दशा में दीनवत् जिनकी चाटुकारी करते हैं, वही [कृष्ण-प्रिया श्रीराधिका] मेरी एक मात्र गति हैं।

