त्वयि रचयति राधिकाऽवनाशा मतिभय मेत्य पलायितव माया ।
हतहृदय कुतोन्विदं तवागाद् विकृतिशतं गगन प्रसून कल्पम् ॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.41)
“तुम्हारी रक्षा करूंगी” - इस प्रकार श्रीराधा के आश्वासन देते ही माया भयभीत होकर भाग गई है। हे दृष्ट हृदय! आकाश फूलों के समान काल्पनिक (झूठे) तुम्हारे सैकड़ों विकार अब कहाँ रहे हैं?
हतहृदय कुतोन्विदं तवागाद् विकृतिशतं गगन प्रसून कल्पम् ॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.41)
“तुम्हारी रक्षा करूंगी” - इस प्रकार श्रीराधा के आश्वासन देते ही माया भयभीत होकर भाग गई है। हे दृष्ट हृदय! आकाश फूलों के समान काल्पनिक (झूठे) तुम्हारे सैकड़ों विकार अब कहाँ रहे हैं?

