निन्दा करे कोई या प्रशंसा ही हमारी करे,
रज के समान वन रज में रहेंगे हम। [1]
मान करे कोई या अपमान ही हमारा हो,
सत्य या असत्य कृष्ण-कज में रहेंगे हम॥ [2]
देह, मन, प्राण, बुद्धि सब को विसारे हुये,
भावना - सुराज्य सज धज में रहेंगे हम। [3]
कीट या पतंग वन चाहे जो वनेंगे किन्तु,
वृन्दावन वास कर व्रज में रहेंगे हम॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (80)
यदि कोई हमारी निंदा करे या स्तुति करे, हम वृन्दावन की रज में रज के समान ही बने रहेंगे। [1]
हम श्री कृष्ण के आश्रय के अभिमान में मस्त रहेंगे, चाहे हमें मान मिले या अपमान, सत्य मिले या असत्य। [2]
हम अपने शरीर, मन, आत्मा और बुद्धि को विस्मृत कर भाव क्षेत्र में दिव्य युगल श्री श्यामा-श्याम के साथ सज-धज (अंग संग) सदा रमेंगे। [3]
श्री डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती जी कहते हैं कि चाहे हम वृन्दावन के कीट-पतंग ही क्यों न बनें, परंतु वृन्दावन वास करते हुए सदा ब्रज में ही बने रहेंगे। [4]
रज के समान वन रज में रहेंगे हम। [1]
मान करे कोई या अपमान ही हमारा हो,
सत्य या असत्य कृष्ण-कज में रहेंगे हम॥ [2]
देह, मन, प्राण, बुद्धि सब को विसारे हुये,
भावना - सुराज्य सज धज में रहेंगे हम। [3]
कीट या पतंग वन चाहे जो वनेंगे किन्तु,
वृन्दावन वास कर व्रज में रहेंगे हम॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (80)
यदि कोई हमारी निंदा करे या स्तुति करे, हम वृन्दावन की रज में रज के समान ही बने रहेंगे। [1]
हम श्री कृष्ण के आश्रय के अभिमान में मस्त रहेंगे, चाहे हमें मान मिले या अपमान, सत्य मिले या असत्य। [2]
हम अपने शरीर, मन, आत्मा और बुद्धि को विस्मृत कर भाव क्षेत्र में दिव्य युगल श्री श्यामा-श्याम के साथ सज-धज (अंग संग) सदा रमेंगे। [3]
श्री डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती जी कहते हैं कि चाहे हम वृन्दावन के कीट-पतंग ही क्यों न बनें, परंतु वृन्दावन वास करते हुए सदा ब्रज में ही बने रहेंगे। [4]

