जप संजम नेम निषेध विधी व्रत - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (34)

जप संजम नेम निषेध विधी व्रत - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (34)

(सवैया)
जप संजम नेम निषेध विधी व्रत, तौ लगि जौ परस्यो न हिया। [1]
पुनि पावत ही सुख स्वाद कछू, बिसरे सुख देह किया न किया॥ [2]
‘श्रीबिहारिनिदासि’ मनोहर कौ सुख, सर्वसु लै हित हाथ दिया। [3]
कोऊ कैसीयै कोटि कहो मुख की, मन प्रेम तो नेम रहै न भिया॥ [4]

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (34)

कोई व्यक्ति विभिन्न नियम जैसे जप, तप, व्रत, संयम, विधि-निषेध का पालन केवल तब तक कर सकता है, जब तक उसके हृदय ने विशुद्ध प्रेमरस का स्पर्श नहीं किया। [1]

परंतु जब उसे इस अद्भुत रस का थोड़ा-सा भी स्वाद लग जाता है, तब यह सब देह की क्रियाएँ स्वतः ही छूट जाती हैं (फिर तो केवल मन से भजन होता है)। [2]

श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि यदि प्रिया-प्रियतम का संपूर्ण मनोहर रस किसी को मिल जाए, तो उस जीव का तो कहना ही क्या! [3]

अरे भैया, कोई मुख से करोड़ बातें क्यों न कहे, पर जिस व्यक्ति के मन में प्रेम है, जो प्रिया-प्रियतम को प्रेमपूर्वक लाड़ लड़ाता है, तो कोई भी नेम (नियम) का टिकना असंभव है। [4]