अलकैं छूटीं वदन पर, श्रम जल कन अभिराम ।
चतुरसखी निरखत रहै, निसि दिन आठौ जाम ॥
- श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (3)
सखी भावापन्न श्रीस्वामी चतुरदासजी कहते हैं कि श्यामा कुंजबिहारी की उस सुरतान्त छवि का मैं अहर्निश निरन्तर अवलोकन किया करता हूँ, जिसमें काली घुँघरारी लटें उनके कपोलों पर लटकी हैं और श्रम-बिंदु मुखचन्द्र को अलंकृत किये हैं।
चतुरसखी निरखत रहै, निसि दिन आठौ जाम ॥
- श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, सिद्धांत की साखी (3)
सखी भावापन्न श्रीस्वामी चतुरदासजी कहते हैं कि श्यामा कुंजबिहारी की उस सुरतान्त छवि का मैं अहर्निश निरन्तर अवलोकन किया करता हूँ, जिसमें काली घुँघरारी लटें उनके कपोलों पर लटकी हैं और श्रम-बिंदु मुखचन्द्र को अलंकृत किये हैं।

