राधा कृष्ण गावै रोम-रोम हरसावै,
मोद झरी सी लगावै पुलाकैव अंग-अंग में। [1]
बात यौ बनावै तामें रूप लै दिखावै,
आप छकै और छकावै सुख पावै या प्रसंग में॥ [2]
पामर पतित महा कपटी कदर्ज नर,
तिनहूँ कौ खंचि बोरि देत प्रेम-रंग में। [3]
कहत अभंग में यौं हिय की उमंग में,
जू मोहि राखौ सदा ऐसे रसिकन संग में॥ [4]
- श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, अभिलाष बत्तीसी
जिनके द्वारा श्री राधा कृष्ण का गुणगान करने से रोम रोम हर्षित हो जाता है एवं प्रेम की मानो झरी से लग जाती है एवं अंग अंग पुलकित हो उठता है। [1]
इस प्रकार की वे रसीली बातें वे सुनाते हैं कि मानो प्रिया लाल का साक्षात रूप उसमें झलक पड़ता है। स्वयं तो वे प्रिया लाल में छके रहते हैं एवं दूसरों को भी छका डालते हैं। [2]
चाहे कैसा भी पामर, पतित, कपटी या कृपण व्यक्ति हो, यदि वे उनका संग करता रहे तो उसे वे प्रेम रंग में डूबा ही डालते हैं। [3]
श्री हित चन्द्र लाल गोस्वामी जी कहते हैं कि हे प्रिया लाल! मुझपर ऐसी कृपा निश्चित ही रखना कि मैं ऐसे अनन्य रसिकों का अनवरत (नित्य) संग करता रहूँ जिससे मेरे ह्रदय में भक्ति की उमंग सदा बढ़ती रहे। [4]
मोद झरी सी लगावै पुलाकैव अंग-अंग में। [1]
बात यौ बनावै तामें रूप लै दिखावै,
आप छकै और छकावै सुख पावै या प्रसंग में॥ [2]
पामर पतित महा कपटी कदर्ज नर,
तिनहूँ कौ खंचि बोरि देत प्रेम-रंग में। [3]
कहत अभंग में यौं हिय की उमंग में,
जू मोहि राखौ सदा ऐसे रसिकन संग में॥ [4]
- श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, अभिलाष बत्तीसी
जिनके द्वारा श्री राधा कृष्ण का गुणगान करने से रोम रोम हर्षित हो जाता है एवं प्रेम की मानो झरी से लग जाती है एवं अंग अंग पुलकित हो उठता है। [1]
इस प्रकार की वे रसीली बातें वे सुनाते हैं कि मानो प्रिया लाल का साक्षात रूप उसमें झलक पड़ता है। स्वयं तो वे प्रिया लाल में छके रहते हैं एवं दूसरों को भी छका डालते हैं। [2]
चाहे कैसा भी पामर, पतित, कपटी या कृपण व्यक्ति हो, यदि वे उनका संग करता रहे तो उसे वे प्रेम रंग में डूबा ही डालते हैं। [3]
श्री हित चन्द्र लाल गोस्वामी जी कहते हैं कि हे प्रिया लाल! मुझपर ऐसी कृपा निश्चित ही रखना कि मैं ऐसे अनन्य रसिकों का अनवरत (नित्य) संग करता रहूँ जिससे मेरे ह्रदय में भक्ति की उमंग सदा बढ़ती रहे। [4]

