(प्रभु) तुम्हरी कृपा अपार है, (अरु) मेरेहु दोष अपार ।
हम तुम यौं सरवरि भये, (यह) मिटहि सु करहु विचार ॥
- श्री कल्याण पुजारी जी, श्री हित कल्याण पुजारी जी की वाणी (236)
हे प्रभु! आपकी कृपा की कोई सीमा नहीं है, वह अनंत और अपार है, परंतु दूसरी ओर मेरे अपराध और दोष भी अनगिनत हैं। इस प्रकार हम और आप एक-दूसरे के समतुल्य हैं। अब आप ही विचार कीजिए कि मेरे दोषों का निवारण कैसे होगा, जिससे मैं आपकी कृपा को प्राप्त कर सकूँ।
हम तुम यौं सरवरि भये, (यह) मिटहि सु करहु विचार ॥
- श्री कल्याण पुजारी जी, श्री हित कल्याण पुजारी जी की वाणी (236)
हे प्रभु! आपकी कृपा की कोई सीमा नहीं है, वह अनंत और अपार है, परंतु दूसरी ओर मेरे अपराध और दोष भी अनगिनत हैं। इस प्रकार हम और आप एक-दूसरे के समतुल्य हैं। अब आप ही विचार कीजिए कि मेरे दोषों का निवारण कैसे होगा, जिससे मैं आपकी कृपा को प्राप्त कर सकूँ।

