ब्रजमोहन ब्रज मैं बसै, नित ब्रजमंगल रूप -  श्री आनंदघन, घनानंद ग्रंथावली, ब्रजविलास (15)

ब्रजमोहन ब्रज मैं बसै, नित ब्रजमंगल रूप - श्री आनंदघन, घनानंद ग्रंथावली, ब्रजविलास (15)

ब्रजमोहन ब्रज मैं बसै, नित ब्रजमंगल रूप ।
घर बाहिर व्यापक सदा, मंगलचरित अनूप ॥

- श्री आनंदघन, घनानंद ग्रंथावली, ब्रजविलास (15)

ब्रज को मोहित करने वाले श्री कृष्ण (ब्रजमोहन) सदैव ब्रज में ही निवास करते हैं और उनका स्वरूप साक्षात् ब्रज का मंगल करने वाला है। वे ब्रज के भीतर और बाहर, हर स्थान पर सदैव व्याप्त हैं और उनके दिव्य चरित्र अत्यंत कल्याणकारी हैं।