हम तो युगल रूप रस माते नाते के माने ।
देही नाते नेक न माने ह्यांते हैं अलसाने ॥ [1]
श्याम सनेही हिये सुहाते नाते तिन सों ठाने ।
वल्ल्भ रसिक फिरें इतराते चितराते उमदाने ॥ [2]
- श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी, सदा की माँझ (6)
हम तो श्री प्रिया प्रियतम के युगल रूप के रस में उन्मत्त हैं, अत: केवल हम युगल से ही अपना सारा रिश्ता मानते हैं । हम देह के नातेदारों को अपना मानते ही नहीं एवं उन्हें अपना मानने में अलसाते हैं । [1]
जो श्री युगल के स्नेही जन हैं वे ही केवल हमारे ह्रदय को सुहाते हैं, अत: हमारा सारा रिश्ता उनसे ही है । श्री वल्लभ रसिक जी कहते हैं कि इस रिश्ते (नाते) के कारण ही हम सदा रस सिंधु में मगन रहा करते हैं । [2]
देही नाते नेक न माने ह्यांते हैं अलसाने ॥ [1]
श्याम सनेही हिये सुहाते नाते तिन सों ठाने ।
वल्ल्भ रसिक फिरें इतराते चितराते उमदाने ॥ [2]
- श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी, सदा की माँझ (6)
हम तो श्री प्रिया प्रियतम के युगल रूप के रस में उन्मत्त हैं, अत: केवल हम युगल से ही अपना सारा रिश्ता मानते हैं । हम देह के नातेदारों को अपना मानते ही नहीं एवं उन्हें अपना मानने में अलसाते हैं । [1]
जो श्री युगल के स्नेही जन हैं वे ही केवल हमारे ह्रदय को सुहाते हैं, अत: हमारा सारा रिश्ता उनसे ही है । श्री वल्लभ रसिक जी कहते हैं कि इस रिश्ते (नाते) के कारण ही हम सदा रस सिंधु में मगन रहा करते हैं । [2]

