पौर्णमासी-मयापि मोदकवृन्ददानापदेशाद् वृन्दाटवीमध्यमासाद्य-
राधेति मङ्गलाक्षरमाधुर्येण माधवकर्णयोर्द्वन्द्रमानन्दनीयम् ।
- श्री रूप गोस्वामी, विदग्धमाधव (1.59)
पौर्णमासी जी कहती हैं - मैं लड्डू बाँटने के बहाने वृन्दावन जाती हूँ और वहाँ जाकर 'राधा'- इन दो मंगलमय अक्षरों के माधुर्य से कृष्ण के कानों को आनन्दित करूँगी ।
राधेति मङ्गलाक्षरमाधुर्येण माधवकर्णयोर्द्वन्द्रमानन्दनीयम् ।
- श्री रूप गोस्वामी, विदग्धमाधव (1.59)
पौर्णमासी जी कहती हैं - मैं लड्डू बाँटने के बहाने वृन्दावन जाती हूँ और वहाँ जाकर 'राधा'- इन दो मंगलमय अक्षरों के माधुर्य से कृष्ण के कानों को आनन्दित करूँगी ।

