(सवैया)
निगमादिक ज्ञान के ग्रंथ अनेक, करैं सब तेरौई गाइन राधे। [1]
रसराज-सिरोमनि स्याम पिया, नित तेरे पलोटत पाइन राधे॥ [2]
इमि मूरत ‘प्रीतम’ हीय बसै यह, आस जगी बरदाइन राधे। [3]
अब तौ अभिलाष पुराइ दै री, अरी ओ ब्रज की ठकुराइन राधे॥ [4]
- कविवर यमुनाप्रसाद 'प्रीतम'
हे श्री राधे! अनगिनत ग्रंथ और वेद आपकी महिमा का गान करते हैं। [1]
रसिक-शिरोमणि प्रियतम श्री श्यामसुंदर सदा आपके चरणों में पूर्ण रूप से शरणागत हैं एवं आपके चरणों को प्रेमपूर्वक दबाते रहते हैं। [2]
हृदय में ऐसी छवि बस गई है कि आपके चरणकमलों की भक्ति की आशा प्रकट हो उठी है। [3]
हे ब्रज की ठकुरानी, श्री राधे! कृपा करके अब तो मेरे हृदय की अभिलाषा को पूर्ण कर दो। [4]
निगमादिक ज्ञान के ग्रंथ अनेक, करैं सब तेरौई गाइन राधे। [1]
रसराज-सिरोमनि स्याम पिया, नित तेरे पलोटत पाइन राधे॥ [2]
इमि मूरत ‘प्रीतम’ हीय बसै यह, आस जगी बरदाइन राधे। [3]
अब तौ अभिलाष पुराइ दै री, अरी ओ ब्रज की ठकुराइन राधे॥ [4]
- कविवर यमुनाप्रसाद 'प्रीतम'
हे श्री राधे! अनगिनत ग्रंथ और वेद आपकी महिमा का गान करते हैं। [1]
रसिक-शिरोमणि प्रियतम श्री श्यामसुंदर सदा आपके चरणों में पूर्ण रूप से शरणागत हैं एवं आपके चरणों को प्रेमपूर्वक दबाते रहते हैं। [2]
हृदय में ऐसी छवि बस गई है कि आपके चरणकमलों की भक्ति की आशा प्रकट हो उठी है। [3]
हे ब्रज की ठकुरानी, श्री राधे! कृपा करके अब तो मेरे हृदय की अभिलाषा को पूर्ण कर दो। [4]

