(राग दरबारी कान्हरा एवं राग विहाग)
अब मोहे धीरज नहीं राधे रानी ।
तुम दर्शन बिन चैन नहीं चित्त पल छिन रहूँ विलखानी ॥ [1]
मिलो दया कर जीवन धन अब हँस बोलो मृदु बानी ।
रुप माधुरी तुमरे कारण तजी लोक कुलकानी ॥ [2]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (113)
हे राधेरानी, अब मेरे ह्रदय में धीरज नहीं है । तुम्हारे दर्शन के बिना अब एक पल का भी चैन नहीं और क्षण क्षण व्याकुल रहता हूँ । [1]
हे जीवन धन, अब अपनी कृपा कर मुझसे आप आन मिलो, और मुस्कुरा कर अपनी परम मृदु वाणी में बोलो । श्री रूप माधुरी जी कहते हैं कि तुम्हारे मिलने के कारण हेतु ही मैंने लोक एवं कुलकानी का सर्वथा त्याग कर दिया है । [2]
अब मोहे धीरज नहीं राधे रानी ।
तुम दर्शन बिन चैन नहीं चित्त पल छिन रहूँ विलखानी ॥ [1]
मिलो दया कर जीवन धन अब हँस बोलो मृदु बानी ।
रुप माधुरी तुमरे कारण तजी लोक कुलकानी ॥ [2]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (113)
हे राधेरानी, अब मेरे ह्रदय में धीरज नहीं है । तुम्हारे दर्शन के बिना अब एक पल का भी चैन नहीं और क्षण क्षण व्याकुल रहता हूँ । [1]
हे जीवन धन, अब अपनी कृपा कर मुझसे आप आन मिलो, और मुस्कुरा कर अपनी परम मृदु वाणी में बोलो । श्री रूप माधुरी जी कहते हैं कि तुम्हारे मिलने के कारण हेतु ही मैंने लोक एवं कुलकानी का सर्वथा त्याग कर दिया है । [2]

