नहिं चाहों बैकुंठ नहिं चहौं ब्रह्मानंद कौं -  श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (347)

नहिं चाहों बैकुंठ नहिं चहौं ब्रह्मानंद कौं - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (347)

नहिं चाहों बैकुंठ नहिं चहौं ब्रह्मानंद कौं ।
नहिं चाहों, वे राम नहीं आनंद नंद कौं ॥ [1]
नहिं चाहों कुंजनि कुंजनि रास बिलास लौं ।
हरि हाँ, श्री हरिदास कह्यौं सोई गहूँ यहो विस्वास लौं ॥ [2]

- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (347)

न तो मुझे वैकुण्ठ चाहिए, न ही ब्रह्मानंद चाहिए । न मुझे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम चाहिए, न ही नंदलाल श्री कृष्ण । [1]

न ही मुझे कुंजों कुंजों का रास एवं महारास ही चाहिए (जो गोपियों का लक्ष्य है) । रसिक शिरोमणि ललिता अवतार स्वामी हरिदास जी महाराज ने युगल के जिस अद्भुत नित्यविहार को गाया है मैं उसको ही अनन्य भाव से ग्रहण करूँगा । [2]