चलो सखी वृन्दावन चलिये मोहन बेनु बजाये री -  श्री चन्द्रसखी जी

चलो सखी वृन्दावन चलिये मोहन बेनु बजाये री - श्री चन्द्रसखी जी

चलो सखी वृन्दावन चलिये मोहन बेनु बजाये री ॥
बेनु सुनत ब्रह्मादिक मोहे, वेद पढ़न नहिं पाये री ।
बेनु सुनत शिव शंकर मोहे, ध्यान धरण नहिं पाये री ॥ [1]
बेनु सुनत इन्द्रादिक मोहे, राज्य करण नहिं पाये री ।
बेनु सुनत सब सन्तन मोहे, भजन करण नहिं पाये री ॥ [2]
बेनु सुनत गौ-बछरा मोहे, चारा चरण न पाये री।
बेनु सुनत खग पंछी मोहे, चुगा चुगण नहिं पाये री ॥ [3]
बेनु सुनत सब गोपी मोहे, काज करत नहिं पाये री।
‘चन्द्रसखी’ भजु बालकृष्ण छबि, हरि चरणन चित लाये री ॥ [4]

- श्री चंद्र सखी जी

अरी सखी, चलो वृंदावन चलते हैं क्योंकि मोहन श्री कृष्ण ने वहाँ वेणु बजायी है । वेणु को सुनते ही ब्रह्मदिक मोहित हो उठे और वेदों को अब वे पढ़ नहीं पा रहे । वेणु को सुनते ही शिव शंकर भी मोहित हो गये जो अब ध्यान नहीं धारण कर पा रहे । [1]

वेणु सुनते ही इन्द्रादिक मोहित हो उठे और अब स्वर्ग का शासन नहीं कर पा रहे । वेणु सुनते ही सब संत मोहित हो उठे जो अब भजन नहीं कर पा रहे । [2]

वेणु सुनते ही गाय बछड़ा आदि मोहित हो उठे जो अब चारा नहीं चर पा रहे । वेणु सुनते ही खग पक्षी आदि मोहित हो उठे जो अब दाना नहीं चुग पा रहे । [3]

वेणु सुनते ही सब गोपियाँ मोहित हो उठी जो अब ग्रह के कार्य नहीं कर पा रही । श्री चन्द्र सखी जी अपने गुरु श्री बालकृष्ण की छवि का ध्यान करते हुए कहते हैं कि हरि के चरणों में अपने चित्त को लगा रहे हैं । [4]