रूप छके झूमत रहैं, तन को तनक न ज्ञान ।
नारायण दृग जल भरे, यही प्रेम पहचान ॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (155)
जो श्यामा-श्याम के रूप को छक कर झूमता हुआ फिरे, जिसे तन का तनिक भी भान न रहे, और जिसकी आँखें अश्रुधार बहाती हों, वही सच्चे प्रेम की पहचान है।
नारायण दृग जल भरे, यही प्रेम पहचान ॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (155)
जो श्यामा-श्याम के रूप को छक कर झूमता हुआ फिरे, जिसे तन का तनिक भी भान न रहे, और जिसकी आँखें अश्रुधार बहाती हों, वही सच्चे प्रेम की पहचान है।

