(राग बिहाग)
तनक हँस हेरो मेरी ओर ।
हम चितवत तुम चितवो नाहीं काहे भई हो कठोर ॥ [1]
निशिदिन तुम्हरो ही नाम रटत हों चातक ज्यों घन घोर ।
'कृष्ण प्रिया' दर्शनके लोभी जैसे चन्द्र चकोर ॥ [2]
- श्री कृष्ण प्रिया जी
श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं कि हे राधे, मेरी ओर थोड़ा सा देख कर मुस्कुरा दो । मैं तुम्हारी ओर लगातार देख रहा हूँ और तुम मेरी ओर थोड़ा भी नहीं देख रही, आप मेरे से क्यों कठोर बनी हो । [1]
जिस प्रकार चातक पक्षी स्वाति की बूँद को ही अनन्य भाव से ग्रहण करता है उसी प्रकार मैं तो निशदिन तुम्हारा ही अनन्य भाव से नाम रटता रहता हूँ । श्री कृष्ण प्रियाजी के दर्शन के ऐसे लोभी हैं जैसे चकोर पक्षी चन्द्र को एक टक व्याकुलता से निहारता रहता है । [2]
तनक हँस हेरो मेरी ओर ।
हम चितवत तुम चितवो नाहीं काहे भई हो कठोर ॥ [1]
निशिदिन तुम्हरो ही नाम रटत हों चातक ज्यों घन घोर ।
'कृष्ण प्रिया' दर्शनके लोभी जैसे चन्द्र चकोर ॥ [2]
- श्री कृष्ण प्रिया जी
श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं कि हे राधे, मेरी ओर थोड़ा सा देख कर मुस्कुरा दो । मैं तुम्हारी ओर लगातार देख रहा हूँ और तुम मेरी ओर थोड़ा भी नहीं देख रही, आप मेरे से क्यों कठोर बनी हो । [1]
जिस प्रकार चातक पक्षी स्वाति की बूँद को ही अनन्य भाव से ग्रहण करता है उसी प्रकार मैं तो निशदिन तुम्हारा ही अनन्य भाव से नाम रटता रहता हूँ । श्री कृष्ण प्रियाजी के दर्शन के ऐसे लोभी हैं जैसे चकोर पक्षी चन्द्र को एक टक व्याकुलता से निहारता रहता है । [2]

