रंग भरे प्यारे बैठे प्यारी संग एरी सखि - श्री श्यामदास

रंग भरे प्यारे बैठे प्यारी संग एरी सखि - श्री श्यामदास

रंग भरे प्यारे बैठे प्यारी संग एरी सखि!
छवि कह कहौं मोपै वरनी न जाति हैं। [1]
लाल कर दर्पन लै दिखरावति हैं लाड़िली कौं,
दोऊ रीझि-रीझि हँसि-हँसि मुसिकाति हैं॥ [2]
मोरचन्द्रिका पर सु मन लग्यौ प्यारी जू कौ,
प्यारे जू कौ मन अँग-अंग में लुभाति है। [3]
दुहँन की कान्ति देखैं बलिहारी “श्यामदास',
निरखि-निरखि शोभा हियरौ सिराति है॥ [4]

- श्री श्यामदास

अरी सखी, प्यारे श्यामसुन्दर रंग में भरकर राधा प्यारी संग बैठे हैं जिसकी अनुपम छवि का वर्णन करने में मेरी वाणी असमर्थ है। [1]

श्री लालजी [कृष्ण] श्री लाड़ली जी [राधा] को अपने हाथों में दर्पण (आईना) लेकर दिखला रहे हैं और दोनों रीझ रीझ कर मुस्कुरा रहे हैं। [2]

श्री प्यारी जू का मन तो श्री कृष्ण की मोर चंद्रिका पर टीका हुआ है, और श्री कृष्ण का मन तो श्री प्रिया जू के अंग अंग से लुभायमान हो रहा है। [3]

श्री श्यामदास जी कहते हैं कि दोनों की छवि की दिव्य कांति को देखकर मैं बलिहारी जा रहा हूँ और मेरा ह्रदय उनकी छवि को निहार निहार कर शीतल हो रहा है। [4]