(राग कान्हरौ)
नई बात कछु, नई रीति सब, नई देखियत प्यारी । [1]
नई हँसनि, चितबन नैनन की, अधरन फरकत न्यारी ॥ [2]
नई चलनि, नई मुरली, नई गति, नई अंग सोहै सारी । [3]
'रसिक प्रीतम' सो नई रति उपजी, बरनत कवि मति हारी ॥ [4]
- गोस्वामी श्री हरिराय जी
प्रिया प्रियतम की अद्भुत छवि का वर्णन करते हुए श्री गोस्वामी हरिराय जी कहते हैं कि आज तो कुछ नवीन ही बात लग रही है, नवीन ही प्रकार की सब रीति है और नवीन ही श्री प्यारी जू दिख रही हैं । [1]
इनकी हंसी भी नवीन प्रकार की है, नैनों का चितवन भी नवीन प्रकार का है और अधरों का हिलन भी न्यारा है । [2]
इनकी चाल भी नवीन प्रकार की है, नवीन ही मुरली है, नवीन ही प्रकार की गति है और अंगों की कांति भी नवीन है जिसमें नवीन साड़ी श्री प्यारी जू ने डाली है । [3]
रसिक प्रीतम लालजी की भी नवीन प्रकार की रति उपज रही है जिसका वर्णन करते हुए कवियों की मति थकित हो रही है । [4]
नई बात कछु, नई रीति सब, नई देखियत प्यारी । [1]
नई हँसनि, चितबन नैनन की, अधरन फरकत न्यारी ॥ [2]
नई चलनि, नई मुरली, नई गति, नई अंग सोहै सारी । [3]
'रसिक प्रीतम' सो नई रति उपजी, बरनत कवि मति हारी ॥ [4]
- गोस्वामी श्री हरिराय जी
प्रिया प्रियतम की अद्भुत छवि का वर्णन करते हुए श्री गोस्वामी हरिराय जी कहते हैं कि आज तो कुछ नवीन ही बात लग रही है, नवीन ही प्रकार की सब रीति है और नवीन ही श्री प्यारी जू दिख रही हैं । [1]
इनकी हंसी भी नवीन प्रकार की है, नैनों का चितवन भी नवीन प्रकार का है और अधरों का हिलन भी न्यारा है । [2]
इनकी चाल भी नवीन प्रकार की है, नवीन ही मुरली है, नवीन ही प्रकार की गति है और अंगों की कांति भी नवीन है जिसमें नवीन साड़ी श्री प्यारी जू ने डाली है । [3]
रसिक प्रीतम लालजी की भी नवीन प्रकार की रति उपज रही है जिसका वर्णन करते हुए कवियों की मति थकित हो रही है । [4]

