नन्द के कुमार हौं तो कहौं बार बार - श्री चरण दास, भक्ति सागर

नन्द के कुमार हौं तो कहौं बार बार - श्री चरण दास, भक्ति सागर

नन्द के कुमार हौं तो कहौं बार-बार,
मोहिं लीजिये उबार ओट आपनी में कीजिये। [1]
काम अरु क्रोध हू की काटौ यम बेड़ी प्रभु,
माँगों एक नाम मोहिं भक्ति दान दीजिये॥ [2]
और की छुटावौ आस, सन्तन कौ दीजै पास,
वृन्दावन निवास मोहिं फेर हूँ पतीजिये। [3]
कहै 'चरणदास' मेरी होय नाहिं हास श्याम,
कहूँ मैं पुकार मेरी श्रवन सुनि लीजिये॥ [4]

- श्री चरण दास, भक्ति सागर

हे नंद कुमार तुमसे बार बार यही विनती करता हूँ कि मुझे अब संसार से उबार कर अपने आश्रय में ले लीजिए। [1]

काम, क्रोध एवं यम आदि की बेड़ियों को काट कर मुझे अपना केवल निज नाम एवं भक्ति प्रदान कीजिए। [2]

अन्य सब की आशा को छुड़वा कर मुझे रसिक संतों का संग प्रदान कर श्री वृंदावन का वास दीजिए जिससे अब मेरा संसार का आवागमन समाप्त हो जाये। [3]

श्री चरणदास जी कहते हैं कि हे स्याम, अब तुम ही मेरे पालनहार हो, अत: तुम ही मेरी लाज रखना क्योंकि मैं ह्रदय से पुकार पुकार कर कह रहा हूँ, कृपा कर मेरी विनती को सुन लीजिए। [4]