श्रीवृन्दाविपिनेश्वरीं स्वमनसि - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (74)

श्रीवृन्दाविपिनेश्वरीं स्वमनसि - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (74)

श्रीवृन्दाविपिनेश्वरीं स्वमनसि स्मृत्वा ब्रजेन्द्रात्मजो
राधेत्यक्षरयोर्युग जपति यत्कुञे सुरोमाज्जित: ।
तत्रागत्य ततः प्रिया प्रकुरुषे किं मंत्रमित्थं गिरा
नर्म्माण्यातनुते मुदा सरसिकां पश्यामि तां कर्हहम्‌ ॥

- श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (74)

जिसके कुंज में बैठकर श्रीव्रजराजनंदन श्रीकृष्ण अपने मन में वृन्दावनेश्वरी श्रीराधारानी का स्मरण कर रोमांचित होकर “राधा”- इन दो अक्षरों का जाप करते हैं तथा उस समय राधिका वहाँ आकर “आप क्या कर रहे हैं? किस मंत्र का जप कर रहे हैं?” इस प्रकार पूछती हुईं नर्म विस्तार करती हैं, उस रसमय “राधाकुण्ड' को मैं कब देखैूँगा ।