देखौ वन बिहरति पिय प्यारी - श्री हित ब्रजपति जी

देखौ वन बिहरति पिय प्यारी - श्री हित ब्रजपति जी

देखौ वन बिहरति पिय-प्यारी ।
नाचत गावत वैंनु बजावत, जमुना तट सुखकारी ॥ [1]
वंशीवट के निकट अली सँग, रासमण्डली धारी ।
उरप तिरप गति लेत सुलप अलि, ‘हित ब्रजपति’ बलिहारी ॥ [2]

- श्री हित ब्रजपति जी

अरे सखी, देखो आज श्री प्रिया प्रियतम वन में विहार कर रहे हैं । वे नाच, गान कर वेणु वादन कर यमुना तट में रस बरसा रहे हैं । [1]

वंशीवट के निकट सखियों के संग उन्होंने रास मण्डल धारण किया है । वे नृत्य में उरप और तिरप नामक गतियाँ मन्द मंद ले रहे हैं, सखियाँ सुंदर गान कर रही हैं जिसको निहार कर श्री हित ब्रजपति बलिहारी जा रहे हैं । [2]