भोरहिं उठि अलिरूप विचारूं ।
अद्भुत नवलकिसोर माधुरी, रूप अनूप निहारूँ ॥ [1]
करि असनान उबटि अंग अंगनि नाना भाँति सिंगारूँ ।
भूषन वसन प्रसादी स्वामिनि पुलकि पुलकि उर धारूं ॥ [2]
सदा रहूं ललितादिक संगी प्रेम भरी अनुहारूँ ।
'अलबेली' श्री वंशी अलि बलि, महल टहल अनुसारूँ ॥ [3]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (20)
सखी भाव की उपासना करने वाले साधक को सुबह उठ कर सखी रूप की भावना करना चाहिए, एवं श्री प्रिया प्रियतम की मानसिक सेवा करते हुए उनकी अद्भुत रूप माधुरी का पान करना चाहिए । [1]
श्री प्रिया प्रियतम को मन से ही उबटन अंगों पर लगाकर स्नान कराना चाहिए, और नाना प्रकार का मन भावन श्रृंगार करना चाहिए। फिर ऐसा मानना चाहिए कि श्री स्वामिनीजी (श्री राधा) की मुझे आभूषण एवं वस्त्रों की प्रसादी मिली है, और पुलकित होकर उसको धारण करना चाहिए । [2]
ऐसा मानना चाहिए कि मैं ललिता आदि सखियों के नित्य ही संग में रहती हूँ और प्रिया प्रियतम को प्रेम से लाड़ लड़ा रही हूँ और उनकी सेवा कर रही हूँ । श्री अलबेली अलि कहती हैं कि मैं वंशी अलि की बलिहारी जाती हूँ जिनकी कृपा से मैं भी महल टहल की अधिकारी बन गई हूँ । [3]
अद्भुत नवलकिसोर माधुरी, रूप अनूप निहारूँ ॥ [1]
करि असनान उबटि अंग अंगनि नाना भाँति सिंगारूँ ।
भूषन वसन प्रसादी स्वामिनि पुलकि पुलकि उर धारूं ॥ [2]
सदा रहूं ललितादिक संगी प्रेम भरी अनुहारूँ ।
'अलबेली' श्री वंशी अलि बलि, महल टहल अनुसारूँ ॥ [3]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (20)
सखी भाव की उपासना करने वाले साधक को सुबह उठ कर सखी रूप की भावना करना चाहिए, एवं श्री प्रिया प्रियतम की मानसिक सेवा करते हुए उनकी अद्भुत रूप माधुरी का पान करना चाहिए । [1]
श्री प्रिया प्रियतम को मन से ही उबटन अंगों पर लगाकर स्नान कराना चाहिए, और नाना प्रकार का मन भावन श्रृंगार करना चाहिए। फिर ऐसा मानना चाहिए कि श्री स्वामिनीजी (श्री राधा) की मुझे आभूषण एवं वस्त्रों की प्रसादी मिली है, और पुलकित होकर उसको धारण करना चाहिए । [2]
ऐसा मानना चाहिए कि मैं ललिता आदि सखियों के नित्य ही संग में रहती हूँ और प्रिया प्रियतम को प्रेम से लाड़ लड़ा रही हूँ और उनकी सेवा कर रही हूँ । श्री अलबेली अलि कहती हैं कि मैं वंशी अलि की बलिहारी जाती हूँ जिनकी कृपा से मैं भी महल टहल की अधिकारी बन गई हूँ । [3]

