प्रानप्रिया सखि आजु बनी -  श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (54)

प्रानप्रिया सखि आजु बनी - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (54)

प्रानप्रिया सखि आजु बनी ।
ओढ़े नीलांबर बिहरति, रति काम केलि रस माँझ सनी ॥ [1]
उमँँगि उमँँगि मिलि कुँवर स्याम तन, औरैं ठान ठनी ।
श्रीललितमोहिनी लाड़ लड़ावत, त्यौं त्यौं बरषत प्रेम घनी ॥ [2]

- श्री ललित मोहिनी देव, श्री ललित मोहिनी देव जू की वानी, रस के पद (54)

एक सखी दूसरी से कहती है - हे सखी ! आज मेरी प्राणप्यारी श्री किशोरी जी बहुत ही सुन्दर सजी हैं । उन्होंने नीलांवर ओढ़ रखा है। रति-काम केली क्रीड़ा (नित्य विहार) के रस में सराबोर होकर वे विहार कर रही हैं । [1]

वे उल्लसित होकर कुंवर किशोर के अंग से मिल भेंट कर आज किसी विचित्र ही आनन्दोत्सव को प्राप्त हो रही हैं । श्री ललित मोहिनी जी उन्हें जैसे जैसे लाड़ लड़ा रही हैं, वे (किशोरीजी) वैसे वैसे ही सघन प्रेम की वर्षा कर रही हैं । [2]