(राग झंझौटी)
मेरौ कछु वस नाहिन करुणामई ।
सुधि बुधि भूलि भरम भटकति हों जू,
करमन करि प्रतिकूल भई ॥ [1]
ज्यों ज्यों सुरझाऊं त्यों त्यों उरझत जू,
ऐसी दशा कोउ आय गई । [2]
सुधि बुधि बिसरि विकल विलपति हों जू,
या जग की त्रयताप तई ॥ [3]
जानत सब जनके जिय की जू,
तुम तैं कौन दुरी हैं दई । [4]
रूपरसिक अलि कहां यह कहां यह जू,
उचित नहीं वलि होति नई ॥ [5]
- श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (72)
हे करुणामई श्री राधिका, मेरे बस में कुछ भी नहीं है । मैं तो अपनी सुधि बुधि भुला कर भ्रम में भटक रहा हूँ, एवं अपने कर्मों द्वारा आपके प्रतिकूल चल रहा हूँ । [1]
हे स्वामिनी, कुछ ऐसी दशा आ पड़ी है कि जैसे जैसे सुलझने का प्रयास कर रहा हूँ वैसे वैसे और ही उलझता जा रहा हूँ । [2]
मेरी ऐसी विकल स्थिति है कि इस जग के तीन प्रकार के तापों में जल रहा हूँ अपनी सुधि बुधि को भुला कर । [3]
हे किशोरी जी, आप तो सबके ह्रदय की स्थिति भली भाँति जानती हो, आपसे कहाँ मेरे ह्रदय की स्थिति छुपी हुई है ? [4]
श्री रूप रसिक देवाचार्य जी कहते हैं कि हे स्वामिनी, कहाँ आप, और कहाँ यह मेरा निकृष्ट मन, अब आपकी कृपा के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है जिससे इस ह्रदय के संताप मिट सकें । [5]
मेरौ कछु वस नाहिन करुणामई ।
सुधि बुधि भूलि भरम भटकति हों जू,
करमन करि प्रतिकूल भई ॥ [1]
ज्यों ज्यों सुरझाऊं त्यों त्यों उरझत जू,
ऐसी दशा कोउ आय गई । [2]
सुधि बुधि बिसरि विकल विलपति हों जू,
या जग की त्रयताप तई ॥ [3]
जानत सब जनके जिय की जू,
तुम तैं कौन दुरी हैं दई । [4]
रूपरसिक अलि कहां यह कहां यह जू,
उचित नहीं वलि होति नई ॥ [5]
- श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (72)
हे करुणामई श्री राधिका, मेरे बस में कुछ भी नहीं है । मैं तो अपनी सुधि बुधि भुला कर भ्रम में भटक रहा हूँ, एवं अपने कर्मों द्वारा आपके प्रतिकूल चल रहा हूँ । [1]
हे स्वामिनी, कुछ ऐसी दशा आ पड़ी है कि जैसे जैसे सुलझने का प्रयास कर रहा हूँ वैसे वैसे और ही उलझता जा रहा हूँ । [2]
मेरी ऐसी विकल स्थिति है कि इस जग के तीन प्रकार के तापों में जल रहा हूँ अपनी सुधि बुधि को भुला कर । [3]
हे किशोरी जी, आप तो सबके ह्रदय की स्थिति भली भाँति जानती हो, आपसे कहाँ मेरे ह्रदय की स्थिति छुपी हुई है ? [4]
श्री रूप रसिक देवाचार्य जी कहते हैं कि हे स्वामिनी, कहाँ आप, और कहाँ यह मेरा निकृष्ट मन, अब आपकी कृपा के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है जिससे इस ह्रदय के संताप मिट सकें । [5]

