तू तौ मेरे प्राननि हूँ तै प्यारी - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (828)

तू तौ मेरे प्राननि हूँ तै प्यारी - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (828)

तू तौ मेरे प्राननि हूँ तै प्यारी ।
नेंकु चितै हँसि बोलिये मोसौं, हौं तो सरन तिहारी ॥ [1]
अंतर दूर करौ अँचरा की, खोलि देहु घूंघट-पट सारी।
‘कृष्णदास’ प्रभु गिरिधर नागर, भरि लीन्हें अँकवारी ॥ [2]

- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (828)

श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं कि हे राधे, तुम तो मुझे प्राणों से भी अधिक प्यारी हो । मैं तो तुम्हारी ही शरण में हूँ, अत: मेरी ओर थोड़ा सा निहार कर हंस कर बोल लीजिए । [1]

अपने आँचल को दूर कर अपने साड़ी के घूँघट का पट खोल मुझे अपने दर्शन दे दो। श्री कृष्ण दास के प्रभु गिरिधर नागर कहते हैं कि मुझे अपने अंक में भर (ह्रदय से लगा) लो । [2]