आजु महा मंगल मन माई ।
अति आनंद भरे दोऊ प्रीतम, करत केलि अपने मन भाई । [1]
अति आधीन आसक्त भये बिबि, रहत परस्पर कंठ लगाई ॥
छिन छिन प्रति दुलरावति गावति चतुर सहचरी हियौ सराई ॥ [2]
- श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (1)
हे सखी, आज मेरा मन महान आनंद को प्राप्त हो रहा है क्योंकि श्री प्रिया प्रियतम दोनों अत्यंत आनंद में भर अपनी रुचि के अनुसार केली विलास (क्रीड़ा) कर रहे हैं। [1]
प्रेमसाक्ति के कारण वे दोनों एक-दूसरे पर मुग्ध हैं और परस्पर आलिंगन बद्ध हो एक-दूसरे के रूप का छक कर पान कर रहे हैं । श्री चतुर सखी (चतुर दास जी) ऐसे दिव्य दम्पत्ति को निरन्तर लाड़ लड़ा रही हैं और उनके गुणों का गान कर रही हैं जिससे उनका मन शीतल हुआ जा रहा है । [2]

