सुनि ध्रुव ऐसी चाहियै, छाँड़ि जगत की रीति -  श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (19)

सुनि ध्रुव ऐसी चाहियै, छाँड़ि जगत की रीति - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (19)

सुनि ध्रुव ऐसी चाहियै, छाँड़ि जगत की रीति ।
जुगल चरन कोमल सुरँग, तिनहीं सौं करि प्रीती ॥

- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (19)

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि यदि इस रस-मार्ग में आगे बढ़ना है तो जगत के व्यवहार को छोड़कर युगल के कोमल एवं सुंदर चरणारविन्दों से ही अनन्य प्रीति करनी चाहिए।