(कवित्त)
कहौ कहा प्रयोजन मोय ऐसे शास्त्र बातन सौं,
जामैं नहिं प्रिया पद कंज मकरंद है। [1]
संतन जे माने ग्रन्थ नाहिं जामैं प्रेम पंथ,
राधा नाम अमृत कौ जोपै ना अनंद है॥ [2]
धाम है वैकुण्ठ दिव्य जहाँ रहें लक्ष्मी निधि,
राधा बिन मेरौ मन तहाँ प्रति मन्द है। [3]
वृन्दावन रानी राजधानी जन्म-जन्म मिलै,
यही जिय चाहूँ चित जामैं ही सुछन्द है॥ [4]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (216)
जिनमें प्रेम-मूर्ति श्रीराधा के चरणों का रस नहीं ऐसे शास्त्रों के समूह से मेरा क्या प्रयोजन ? [1]
ऐसे साधुजन, उनके द्वारा गृहीत मार्ग-समूहों से भी हमको क्या प्रयोजन है अर्थात् हमारे लिए उनका संग उचित नहीं जो राधा नाम के अमृत से ना भरे हों। [2]
जहाँ मेरी श्रीराधा नहीं है उस वैकुण्ठ धाम से ही हमको क्या प्रयोजन ? वहाँ मेरा मन राधा के बिना कैसे सुख पाएगा ? [3]
किन्तु चाहे कोटि कोटि बार ही जन्म क्यों न हो, मेरे यही आशा है कि श्री धाम वृंदावन में ही रहूँ जो मेरी राधा महारानी की राजधानी है। [4]
कहौ कहा प्रयोजन मोय ऐसे शास्त्र बातन सौं,
जामैं नहिं प्रिया पद कंज मकरंद है। [1]
संतन जे माने ग्रन्थ नाहिं जामैं प्रेम पंथ,
राधा नाम अमृत कौ जोपै ना अनंद है॥ [2]
धाम है वैकुण्ठ दिव्य जहाँ रहें लक्ष्मी निधि,
राधा बिन मेरौ मन तहाँ प्रति मन्द है। [3]
वृन्दावन रानी राजधानी जन्म-जन्म मिलै,
यही जिय चाहूँ चित जामैं ही सुछन्द है॥ [4]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (216)
जिनमें प्रेम-मूर्ति श्रीराधा के चरणों का रस नहीं ऐसे शास्त्रों के समूह से मेरा क्या प्रयोजन ? [1]
ऐसे साधुजन, उनके द्वारा गृहीत मार्ग-समूहों से भी हमको क्या प्रयोजन है अर्थात् हमारे लिए उनका संग उचित नहीं जो राधा नाम के अमृत से ना भरे हों। [2]
जहाँ मेरी श्रीराधा नहीं है उस वैकुण्ठ धाम से ही हमको क्या प्रयोजन ? वहाँ मेरा मन राधा के बिना कैसे सुख पाएगा ? [3]
किन्तु चाहे कोटि कोटि बार ही जन्म क्यों न हो, मेरे यही आशा है कि श्री धाम वृंदावन में ही रहूँ जो मेरी राधा महारानी की राजधानी है। [4]

