धन धन वृन्दावन की चैंटी ।
महाप्रसाद को किनका लैके जाय भिले में बैठी ॥ [1]
है गयो ज्ञान ध्यान हृदय में व्याधि जन्म की मैटी ।
अभयराम येहूं बड़भागिनि रज में रहैं लपेटी ॥ [2]
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (74)
धन्य है वृंदावन की चींटी जो महाप्रसाद का कण लेकर बिल में बैठ कर खाती है । [1]
जिसके माध्यम से यह जन्म और मृत्यु की व्याधि को नष्ट कर, भीतर से ज्ञान एवं ध्यान को प्राप्त करती है । श्री अभयराम कहते हैं, "वृंदावन की चींटी कितनी धन्य है क्योंकि यह वृंदावन की रज से ही लिपटी रहती है"। [2]
महाप्रसाद को किनका लैके जाय भिले में बैठी ॥ [1]
है गयो ज्ञान ध्यान हृदय में व्याधि जन्म की मैटी ।
अभयराम येहूं बड़भागिनि रज में रहैं लपेटी ॥ [2]
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (74)
धन्य है वृंदावन की चींटी जो महाप्रसाद का कण लेकर बिल में बैठ कर खाती है । [1]
जिसके माध्यम से यह जन्म और मृत्यु की व्याधि को नष्ट कर, भीतर से ज्ञान एवं ध्यान को प्राप्त करती है । श्री अभयराम कहते हैं, "वृंदावन की चींटी कितनी धन्य है क्योंकि यह वृंदावन की रज से ही लिपटी रहती है"। [2]

