(कवित्त)
कीरति-कुमारि तुम बड़ी रिझवारि,
करुना की दृष्टि धारि मेरी बिनै चित लाइए। [1]
लाड़िली कृपाल ए हो परमदयाल मैं हौं,
निपट बिहाल ताहि बेगि अपनाइए॥ [2]
अलि-गन माहि मोहिं राख गहि बाँह,
यह पूरौ मन-चाह बलि बेर न लगाइए। [3]
बंसी अलि संग नित देखौं रति-रंग,
हे किसोरी अलि अंग करि बिपिन बसाइए॥ [4]
- श्री किशोरी अलि
हे कीर्तिकुमारी श्री राधिका, तुम तो दीन जनों पर सदा प्रसन्न रहती हो (कृपा करने वाली हो), मेरी भी विनय को ह्रदय में लाकर मेरी ओर करुणा की दृष्टि डालिये। [1]
हे लाडलीजी, आप तो कृपालु हो, परम दयालु हो, मैं तो अत्यंत व्याकुल हूँ, मुझे जल्दी से जल्दी अपना बना लीजिए। [2]
मेरी बाँह को पकड़ कर अपनी सहचरियों में मुझे रख दो, ऐसी मेरी ह्रदय की चाह को पूर्ण करिए, इसमें विलंभ न कीजिए। [3]
श्री किशोरी अलि जी कहते हैं कि हे राधे, ऐसी कृपा कीजिए कि श्री वंशी अलि जी के संग में सदा आपका विहार रस का अवलोकन करता रहूँ, अत: मुझे अपना अंगीकार कर वृंदाविपिन का अखंड वास प्रदान कीजिए। [4]
कीरति-कुमारि तुम बड़ी रिझवारि,
करुना की दृष्टि धारि मेरी बिनै चित लाइए। [1]
लाड़िली कृपाल ए हो परमदयाल मैं हौं,
निपट बिहाल ताहि बेगि अपनाइए॥ [2]
अलि-गन माहि मोहिं राख गहि बाँह,
यह पूरौ मन-चाह बलि बेर न लगाइए। [3]
बंसी अलि संग नित देखौं रति-रंग,
हे किसोरी अलि अंग करि बिपिन बसाइए॥ [4]
- श्री किशोरी अलि
हे कीर्तिकुमारी श्री राधिका, तुम तो दीन जनों पर सदा प्रसन्न रहती हो (कृपा करने वाली हो), मेरी भी विनय को ह्रदय में लाकर मेरी ओर करुणा की दृष्टि डालिये। [1]
हे लाडलीजी, आप तो कृपालु हो, परम दयालु हो, मैं तो अत्यंत व्याकुल हूँ, मुझे जल्दी से जल्दी अपना बना लीजिए। [2]
मेरी बाँह को पकड़ कर अपनी सहचरियों में मुझे रख दो, ऐसी मेरी ह्रदय की चाह को पूर्ण करिए, इसमें विलंभ न कीजिए। [3]
श्री किशोरी अलि जी कहते हैं कि हे राधे, ऐसी कृपा कीजिए कि श्री वंशी अलि जी के संग में सदा आपका विहार रस का अवलोकन करता रहूँ, अत: मुझे अपना अंगीकार कर वृंदाविपिन का अखंड वास प्रदान कीजिए। [4]

